Hindi poems | kavita kosh | ख्वाहिशो के पंख

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  1. एक लडका था एक लडकी थी प्रभू की लीला आसन्य हुए धनीराम धीमर के घर जुडवा बच्चे उत्पन्न हुए मां ने दोहरा व्यवहार किया बेटे की गरीमा बडी रही लडके को गोदी उठा लिया लडकी धरती में पडी रही बेटे को मां की गोद मिली बेटी दाई ने बहला दी लडके को पानी गरम किया लडकी ठंडे से नहला दी फिर एक नया झबला आया था एक पुराना दिला दिया बेटे को मां का दूध मिला बेटी को पानी पिला दिया मां बाप खिलाते नम्बर से वह सोता है या जगता है पालना अलग उसकी खातिर तलवार बगल में रखता है उस पर से आग जला करती थी उसे घेर कर गोले में लडकी बेचारी पडी रहे एक टूटे हूए खटोले में लडका वह गोदी चूटन पर पलती है एक हमेषा मुस्काता था एक के अंासू बहते थे लडके का नाम पडा सुखिया लडकी को दुखिया कहते थे कुछ बडे हुए षिक्षा देने का जब मां बाप का फर्ज हुआ तब नाम एक विधालय में केवल लडके का दर्ज हुआ लडकी से उसकी मां बोली तू मेरा पेट भरेगी क्या अपने भाइ्र्र को पढने दे तू पढ कर भला करेगी क्या दुखिया को सूखे कौर नही सुखिया की आदत चटटे की लडके पर कपडांे की जोडी लडकी पर कमी दुपटटे की बेटे को षिक्षा देने में सब बेच दिये लोटा थाली लडकी का भार हटाने को दुखिया गरीब के घर डाली लडका था खासा पढा लिखा सो उसे नौकरी खास मिली शादी अपनी मर्जी से कि एक लडकी एम.ए. पास मिली धीरे-धीरे कमजोर हुए मां बाप बुढापा ढला गया लडका अपनी पत्नी को लेकर के सर्विस पर चला गया लडकी भी कब घर रहने वाली वह भी अपनी ससूराल गई मां बाप अकेले सोच सोच सब सूख बदन की खाल गई फिर खेल विधाता ने खेला बूढा तन हो बीमार गया बुढिया कि अंाखे चली गई बू बेटे के पास चले दोनो ले लिया सहारा आपस में कंधे पर झोला लटकाया ढूंढते-2 पहुंच गये खुष हो दरवाजा खटकाया सरकारी बंगला द्वारे पर चिकना परदा पडा हुआ कंुडी खटकी फिर द्वार खुला था सुखिया सम्मुख खडा हुआ वह पास गये गद-गद हो कर बेटा है पक्का जान लिया आंखो में भर आंसू बोली बेटा मां को पहचान लिया हम मजबूरी में आये है सारी आषाएं टूट गई इनको लखूआ ही मारा हे अम्मा की आंखे फूट गई ये बाप तुम्हारा बु िलेना बेटे घर में एक अंघी आया है उसने देखा अंधी बुढिया बूढा लंगडा लाचारी है हम कब तक इन्हें खिलाएगें ये बरसों की बीमारी है वो बोला मेरे भी बच्चे है हम इनको खिला ना पाते हे यंहा पर रहना तो मुष्किल है तुमको तरकीब बताते है जो वृद्ध अवस्था में आकर अंधे लंगडे हो जाते है वो लिए कटोरा सडकों पर फिर भीख मांग कर खाते है इतना कह कर चल दिया वंहा से अपने तन में अकड लिए बुढे ने फिर आगे बे पगडा बढा रहे तुमने जो हमें पढाया था हम भी तो बच्चे पढा रहे बूढे ने फिर लाचारी से कदमांे मंे माथा टेक दिया बेटे ने अपने हाथो से लंगडे में धक्का एक दिया बेटाकृबेटाकृ.बेटाकृवह थोडा चिल्लाया स्वर थोडा उसने बुंलद किया सुखिया ने अन्दर घुस कर के बंगले का दरवाजा बंद किया बेटे का यह सलूक दोनो कुछ देर देखते रहे खडे आंखो में फिर आसूं भर कर के चल दिए शहर की ओर बढे बुढिया बोला इससे अच्छा हम मारे-मारे फिरंे कहीं चल कटे रेल के संग-संग या सगं कुए में गिरे कहीं बूढा बोला मरना ही है दो कदम वंहा टेकते चले मरने से पहले हम अपनी दुखिया को भी देखते चले जा कर पहुंचे जब बस्ती में दुखिया पानी भर रही खडी अंधी मां लंगडे बाप खडे जैसे ही उनपर नजर पडी कलषा कुएं में छोड दिया भग चली फुलाती गाल चली बूढे मां बाप से लिपट गई रोती-रोती बेहाल हुई ले गई पकड कर दोनो को सब गंदे वस्त्र उतरवाए फिर बडे प्रेम से नहलाया दोनो को भोजन करवाए महीनो से साल रहा दिल में वह घाव भूख का मिटा दिया पहना कर उनको नये वस्त्र बिस्तर पर उनको लिटा दिया शाम को पति उसका आया उन दोनो मे प्रतिवाद हुआ दुखिया बोली सुनिए स्वामी मेरा भाई अपवाद हुआ अब नही सहारा है कोई अंधे लंगडे लाचारी है और चार रोटीयों की खातिर ही मेरे पास पधारे है जो चाहे आप सजा दे दो हम करती अगर जो खता है है आप हमारे परमेष्वर तो ये भी जन्म देवता है मैं नही चाहती हॅू इनकी खातिर तुम बरवादी कर लो अभी नही कुछ बिगडा है तुम दूजी शादी कर लो श्री मान आप सब लायक हो बंधन इस लिए तोड सकती मां बाप निरे आपंग हुए में इनको नही छोड सकती बेटी का कर्तव्य देख धरती थोडी सी सिमट गई मां बाप ले लिए संग रात में अपने घर निकल गई लकडी काटी चाखी पीसी बीडी के बंडल भर लेती इस तरह बचाा कर हफते में कुछ दााम इक्ट्ठे कर लेती रूखा सूखा खाना खाती ना लेती स्वाद निवालो में कर लिए बैकं में नोट जमा पन्द्रह हजार दो सालो मे फिर अस्पताल ले गई उन्हे मर्जी से स्वंय निकलवादी दुखिया ने अपनी एक आंख अपनी अम्मा को लगवा दी मां बाप का कर्ज हुआ करता उसकी कर्तव्य बेबाकी दी लंगडे बापू के चलने को ला कर उसने बैषाखी दी मिल गइ्र्र जिन्दगी दोनो को मां बाप ने तब गुण पहचाने हमने कैसा अन्याय किया बीते दिन याद लगे आने बेटे की तुलना में बेटी को जीवन शैली खोटी दी उसको सारी सूविधाएं दी इसको भर पेट ना रोटी दी पछताए मन्दिर पहुचे जा कर षिव जी के चरण छुए भगवान माफ कर दो हमको भावुक थे ज्यादा दुखी हुए उन दोनो की श्रद्धा देखी षिवजी की महिमा डोल उठी हो गया उजाला मन्दिर में आवाज कहीं से बोल उठी उठ भगत दुखी मत ज्यादा हो में सकल विष्व का भ्रता हॅू हो तो तुम पापी बहूत बडे पर माफ तुम्हे मैं करता हॅू सत्य अनोखा जगत सार है जो करना है वो भरना है जब जन्म दोबारा तुम्हें मिले तब काम तुम्हें ये करना है उस समय पाप ज्यादा होगा कुछ दुष्ट जमीं पर आएगें होगा तब भ्रूण परीक्षण भी कन्या के गर्भ गिराएंगंे कन्या जग जननी होती है उसका अस्तित्व बचाना है तब जगह-2 तुम्को पाता हॅू बेटी का प्यार ना छीनों तुम यह भी संतान तुम्हारी है इसका अधिकार ना छीनों तुम बेटी सुख सुविधा और गौरव को अर्पण करने वाली हो सकती है बेटा रावण हो सकता है बेटी सीता हो सकती है।

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